मन-अंतरंग

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28 dating 22 कुछ जवाब अधूरे,
कभी नींद मे चाहा करूँ पूरे।
पर नींद अकेली कहाँ है होती,
बस ये आँखें ही हैं सोती।।

köp Viagra अब सोने से डर लगता है,
कि सपनों को सच ना समझ लूँ।
कहीं आँख खुले तो दुनिया को,
छल, छलावा, भ्रम ना समझ लूँ।।

site de rencontre gratuit parents celibataires साया है पुरानी रीतों का,
जो आज भी कचोंटता है।
कहीं आने वाले तूफ़ान की वजह,
मैं खुद को ना समझ लूँ।।

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सूना, सन्नाटा सहमा हुआ;
गम्भीर चेतावनी देता हुआ,
मेरी दृढता की परीक्षा लेता हुआ।।

Free ways to collect money online एक छोटे से इशारे को प्रेरणा समझ बढ गई,
और बढते-बढते इतना आगे निकल गई
कि पीछे मुडकर जब देखा,
तो खुद को अकेला पाया।

go to site मोतियों सी जो थी मृदु अनुभती
बन रही सबल विचारधारा।

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site rencontre fb इस आत्मनिर्भरता का जो चढा है जुनून
कहीं औरों की तरह इसे क्षय की शुरूआत ना समझ लूँ।।

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