मन-अंतरंग

कुछ जवाब अधूरे,
कभी नींद मे चाहा करूँ पूरे।
पर नींद अकेली कहाँ है होती,
बस ये आँखें ही हैं सोती।।

अब सोने से डर लगता है,
कि सपनों को सच ना समझ लूँ।
कहीं आँख खुले तो दुनिया को,
छल, छलावा, भ्रम ना समझ लूँ।।

साया है पुरानी रीतों का,
जो आज भी कचोंटता है।
कहीं आने वाले तूफ़ान की वजह,
मैं खुद को ना समझ लूँ।।

एक रस्ता मिला अलग,
सूना, सन्नाटा सहमा हुआ;
गम्भीर चेतावनी देता हुआ,
मेरी दृढता की परीक्षा लेता हुआ।।

एक छोटे से इशारे को प्रेरणा समझ बढ गई,
और बढते-बढते इतना आगे निकल गई
कि पीछे मुडकर जब देखा,
तो खुद को अकेला पाया।

मोतियों सी जो थी मृदु अनुभती
बन रही सबल विचारधारा।

पर आज भी डर लगता है…

इस आत्मनिर्भरता का जो चढा है जुनून
कहीं औरों की तरह इसे क्षय की शुरूआत ना समझ लूँ।।

rashmi Written by:

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